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संहिता काल की नारी बौद्धिक परम्परा

Author Name: Bhanupriya Date: 24-04-2026

भूमिका (Introduction):
संस्कृत साहित्य को सामान्यतः वैदिक एवं लौकिक इन दो भागों में विभाजित किया जाता है, जिनमें वैदिक साहित्य को सर्वाधिक प्राचीन तथा भारतीय समाज, धर्म, संस्कृति एवं मानवीय जीवन के अध्ययन का प्रमुख स्रोत माना गया है। वैदिक साहित्य के संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद ये चार भाग ज्ञान, यज्ञीय परम्परा तथा दार्शनिक चिंतन के क्रमिक विकास को प्रदर्शित करते हैं।

विषयोपस्थापना:
प्रस्तुत शोध में संहिता काल के अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के आधार पर नारी की मानसिक स्थिति, सामाजिक स्थान एवं जीवनानुभवों का विश्लेषण किया गया है। वेदों में नारी के विविध रूप कन्या, पत्नी, माता, विदुषी एवं ऋषिका का वर्णन उसके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाता है।

शोधपद्धति
इस शोध में वैदिक संहिताओं का पाठविश्लेषण (Textual Analysis) एवं तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Study) पद्धति का उपयोग किया गया है, जिसके माध्यम से विभिन्न वेदों में नारी की स्थिति, अधिकारों एवं सामाजिक भूमिका का अध्ययन किया गया है।

शोधपरिणाम :
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि संहिता काल में नारी को शिक्षा, उपनयन एवं वैवाहिक स्वतंत्रता प्राप्त थी, जिससे उसकी बौद्धिक एवं मानसिक उन्नति संभव हुई। किन्तु ऋग्वेद से अथर्ववेद तक के काल में शिक्षा-निषेध, सभा-प्रतिबंध एवं बहुविवाह के कारण नारी की स्थिति में परिवर्तन दृष्टिगत होता है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक स्वतंत्रता एवं शिक्षा नारी सशक्तिकरण के प्रमुख आधार रहे हैं।

Keywords:
वैदिक साहित्य, संहिता काल, नारी, नारी शिक्षा, वैवाहिक स्वतंत्रता, मानसिक स्थिति, नारी सशक्तिकरण

 

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