Author Name: Deepmalika Date: 24-04-2026
भूमिका –
भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में स्मृतिकरों के द्वारा नारी को एक तरफ पारिवारिक एवं धार्मिक जीवन का आधार माना है और दूसरी तरफ आर्थिक व समाजिक संरचना एवं पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अन्तर्गत नारी के अधिकारों को भी सीमित किया है। इस संदर्भ मे याज्ञवल्क्य स्मृति एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसकी विषय निरूपण पद्धति अन्य ग्रंथों की अपेक्षा अत्यंत सुग्रथित है।याज्ञवल्क्य स्मृति के व्यवहार अध्याय मे 25 प्रकरण है, जिसमे विधि के अंतर्गत वर्णित तीसरा विषय दायविभाग (उत्तराधिकार एवं सम्पत्ति विभाजन) है। याज्ञवल्क्य के सभी व्यवहार पदों में सबसे अधिक श्लोक इसी विषय पर मिलते है। दायभग केवल (सम्पत्ति के विभाजन) की कानूनी विधि नही है अतः यह तत्कालीन समाजिक शक्ति संरचना का भी एक जीवंत दर्पण है। अतः याज्ञवल्क्य से पूर्ववर्ती स्मृतिकारो (जैसे आचार्य मनु) ने नारी के अधिकारों को अत्यंत सीमित रखा था। किंतु याज्ञवल्क्य के द्वारा नारी को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। और नारी को केवल आश्रित रूप मे ही नही बल्कि अधिकार संपन्न रूप मे भी मान्यता देने का प्रयास किया।
शोध उद्देश्य
प्रस्तुत शोध पत्र का विषय “याज्ञवल्क्य स्मृति मे नारी के दाय संबंधी अधिकार” है। जिसका मुख्य उद्देश्य स्त्रियों के अधिकारों का विश्लेषण करना है। अतः यह जानना है कि किस प्रकार से याज्ञवल्क्य के द्वारा नारी के सम्पत्ति संबंधि अधिकारों को सुदृढ़ किया गया अतः पत्नी, पुत्री, और विधवा को दाय में भागीदारी का अधिकार स्त्रीधन की मान्यता तथा पुत्राभाव में उत्तराधिकार की स्वीकृति ने नारी की समाजिक एवं आर्थिक स्वायत्तता को किस प्रकार से सुरक्षित किया परंतु नारी सम्बंधित अधिकार के विषय मे यह प्रश्न उठता है कि क्या ये अधिकार वास्तविक सशक्तिकरण था या फिर पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर नियंत्रित समावेश का उदाहरण. अतः दायभाग सिर्फ सम्पति का प्रश्न नही बल्कि शक्ति संतुलन का भी प्रश्न है।
शोध प्रविधि
इस शोध पत्र में व्याख्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धतियों का प्रयोग किया गया है। इसके अंतर्गत याज्ञवल्क्य स्मृति के दायभाग संबंधी सिद्धांतों का गहन एवं सूक्ष्म अनुशीलन करते हुए नारी से संबंधित अधिकारों का विस्तृत विवेचन किया गया है।जिसमें दाय के नियमों, उत्तराधिकार की व्यवस्था तथा नारी की स्थिति से संबंधित प्रावधानों का तात्त्विक एवं वैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करते हुए मनुस्मृति जैसे अन्य प्रमुख धर्मशास्त्रीय ग्रंथों के साथ तुलनात्मक अध्ययन को प्रस्तुत कर ।नारी के दाय संबंधी अधिकारों में निहित समानताओं एवं भिन्नताओं को स्पष्ट किया गया है। यह अध्ययन स्त्री से संबंधित अधिकारों के क्रमिक विकास, परिवर्तनशील स्वरूप तथा उनके सामाजिक-वैधानिक अधिकारों का एक सुव्यवस्थित एवं तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अपेक्षित परिणाम
निष्कर्षतः वर्तमान काल मे जब नारी की आर्थिक आत्मनिर्भरता और पैतृक सम्पति मे समान अधिकार प्रमुख वैश्विक परामर्श का विषय है तब याज्ञवल्क्य के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक एवं मार्गदर्शक सिद्ध होते है।अतः यह शोध नारी के दाय संबंधी अधिकारों के विषय में एक संतुलित बहुआयामी विधिक दृष्टिकोण को प्रकाशित करेगा ।
मुख्य शब्द : स्त्री-धन, याज्ञवल्क्य स्मृति, दाय संबंधी अधिकार,पितृसत्तात्मक संरचना, आर्थिक स्वायत्तता ।